सूर्य की रोशनी मे सात रंग होते हुये भी हमारी आंखे उन सातो रंगो को अलग अलग कर के नही देख पाती।मानव मन मे नौ भाव होते हुये भी हम सारे भावो को एक साथ कभी अनुभव ही नहीं कर पाते। आखिर क्यू ??
अब आप कहेंगे कि ये हमारे आंखो या मन की सीमा (Limitation) है.
मतलब साफ है कि मानव इसी कायनात का एक छोटा सा हिस्सा है और इस मानव के Hardware यानी के शरीर और Software यानी के मन की अपनी सीमाये है या अपने कुछ दायरे है I तो फिर हम मानव अपने आप को कायनात की सर्वश्रेष्ठ सजीव प्रजाति कैसे कह सकते है.?
अब अगर सीमाये है तो फिर बडा या आगे कौन?? सीधी सी बात जिसकी सीमा जितनी बडी वो उतना ही बडा या वो उतना ही आगे । इस तुलनात्मक अध्ध्यन मे सभी ज्ञात सजीवो को शामिल करने की जरुरत है । ठीक जैसे कि हम विश्व के विकाश मे सभी देशो के विकाश दर का तुलनात्मक अध्ध्यन कर के अलग अलग देशो की रैंक बताते है वैसे ही सभी जीवो के सुख शांति का तुलनात्मक अध्ध्यन कर के मानव की रैंक ज्ञात की जाय तो मानव का स्तर कहा होगा, क्योकि मानव अपने द्वारा किये गये विकाश के पीछे सुख और शांति का ही बहाना करता आया है।
अगर मानव के शरीर और मन की सीमाये जानवरो से भी कम है तो फिर मानव जानवरो मे श्रेष्ठ
कैसे?? यदि Human is a Social Animal तो फिर कौन सा जानवर अकेले रहता है, जो सोशल नही है. ??शायद मानव जानवरो से श्रेष्ठ नही है इसिलिये तो गाय,भैंस बकरी ऊंट इत्यादि जानवरो के उपर अभी तक आश्रित है और कुत्ते बिल्ली खरगोस आदे जानवरो की सेवा करता है। यहा तक की राह चलते रोड मे अगर ग़ाय सामने आ जाये तो उसे बिना व्यवधान दिये बगल से चला जाता और गाय मजे से बीच रोड मे आराम करती रहती है। बेचारी गाय या बेचारा मानव?? अब अगर मानव मे दम है तो झुंड मे चलने वाली गाय के रास्ते मे आके देख ले...हम इसे मानवो के लिये मानवता का नाम दे सकते पर दूध देने वाली गाय को आप क्या नाम देंगे जो खुद के बच्चे से ज्यादा मानव को दूध पिला रही है?
भले जानवर अपने भोजन के लिये किसी का आखेट करता हो परंतु मानव के विकाश ने तो उसके खुद के साथ साथ अन्य सजीवो के लिये भी खतरा खडा किया है, सुख शांति का तो पता नही।
समस्या या मन मे गमगीनता तब पैदा होने लगती है,
१) जब हम मानव अपने प्राकृतिक दायरे से अलग अपने मन से रची समस्या और इसके समाधान के पीछे पड जाते है .
२) हम प्राकृतिक होते हुये भी जब हम प्रकृति के नियमो से अलग अपने मन से बनाये नियमो मे चलना शुरु कर देते है.
३) जब हम प्रकृति से अलग अपना वजूद खोजने लगते है.
४) प्रकृति के अन्दर Tuned होने के बजाय खुद को प्रकृति के बाहर Tuned करने की कोशिस शुरु कर देते है और इसी बाहरी Tuning को हम जिंदगी या जीवन का नाम देते है.
प्रकृति रंगीन,सुखमय और शांति प्रदाय है क्योंकि प्रकृति सत्य है और जो असत्य है वो इसके विपरीत है..यदि मानव इसके विपरीत है तो इसमे प्रकृति का दोष नही। यही विपरीत तो मानव की स्वतह प्रकृति है जो कि सर्वथा प्राकृतिक है।
कहने का मतलब बस इतना है कि कुछ भी मानव निर्मित या कृत्रिम नही है सब उसी एक प्रकृति का हिस्सा या रूपान्तरण है। इन सब के बीच रंगीन बने रहने के लिये जरुरत है तो खुद को प्राकृतिक रखने की और इसका सीधा कनेक्शन हम मानवो की पिट्युटरी ग्लांड से है.. जिसका जिक्र विज्ञान के किसी लेख मे करूंगा या इसके लिये आप René Descartes की philosophy भी पढ सकते हे । ...................................................................................................................................स्वतह
बेहतरीन लेख..आशा करता हूँ कि आगे भी लिखते रहोगे । बस एक बात थोड़ी एडिटिंग रह गयी ।
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